बीर अमर माहल, अमृतसर ।
दिव्य ज्योति जागृति संस्थान की ओर से श्री दुर्गायाना मंदिर, अमृतसर में श्री राम कथा अमृत का आयोजन किया जा रहा है। जिसमें सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या साध्वी गरिमा भारती जी ने प्रभु श्री राम जन्म प्रसंग को भगवत प्रेमियों के आगे बड़े ही रोचक ढंग से प्रस्तुत किया। महाराज दशरथ जो पुत्र की इच्छा लेकर जब अपने गुरुदेव वशिष्ठ के पास जाते हैं तो गुरुदेव वशिष्ठ उन्हें चार पुत्र रत्न की प्राप्ति का वरदान देते हैं।

यज्ञ नारायण भगवान की कृपा से उनके घर में श्री हरि नारायण मां कौशल्या की गोद से जन्म ले करके आते हैं। यह बाहरी अयोध्या नगरी में प्रभु श्री राम जी का प्राकट्य हमें संकेत करता है कि हम अपने अंतर्गत में प्रभु श्री राम को प्रकट करें। वास्तव में यह हमारा जो शरीर है इसे ग्रंथों के अंदर अयोध्या कह कर के संबोधित किया। 8 चक्रों नवद्वारों से सुसज्जित यह मानव की देही जिसमे परमात्मा श्री राम ज्योति रूप में विद्यमान हैं।

आवश्यकता है एक ऐसे सतगुरु की जिसके माध्यम से हम अपने अंतर्गत में उस प्रभु श्रीराम के ज्योति स्वरूप का साक्षात्कार कर पाए। प्रभु श्री राम ने जन्म लेकर न केवल महाराज दशरथ व महारानी कौशल्या को धन्य किया। इस धरा पर प्रभु श्री राम जी के आने का उद्देश्य प्रत्येक जीवात्मा के अंतर्गत में बैठे उसे निराकार परमात्मा से मानव को अवगत करवाना है। प्रभु श्री राम जी का जन्म ही नहीं, उनका पूरा जीवन चरित्र मानव के उत्थान के लिए है।

गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि प्रभु श्री राम जी का व्यक्तित्व बताता है ‘प्रात काल उठकर रघुनाथा, मात पितु नवविहि माथा’ अपने गुरु माता पिता का सम्मान करना हमारी संस्कृति हमें सिखाती है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम हमें प्रेरणा देते हैं कि हम अपने जीवन में नैतिक मूल्यों को धारण करें, जो नैतिक मूल्य मानव के व्यक्तित्व को मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम की मानिद् सुंदर बनाते हैं। लेकिन आज इस समाज का यह दुर्भाग्य है कि प्रभु श्री राम जी के भक्त होने के पर भी हम अपनी सुंदर संस्कृति व संस्कारों को न अपनाकर पाश्चात्य संस्कृति के अनुसार अपनी जीवनशैली को अपनाते हैं। जिसके परिणाम स्वरूप आज बच्चे माता-पिता का सम्मान नहीं करते , वृद्ध आश्रमों की संख्या निरंतर बढ़ती चली जा रही है सर्व श्री आशुतोष महाराज जी आज समाज में संस्कार विहीन संतानों को वह वृद्ध आश्रमों को बढ़ते देखकर प्रत्येक जीवात्मा के अंतर्गत में उस ब्रह्म ज्ञान को रोपित कर नैतिक मूल्यों को पोषित कर रहे हैं। सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का कहना है कि मानव का जीवन एक वृक्ष की समान है जिसके ऊपर फल फूलों रुपी नैतिक मूल्य तभी रोपित हो सकते हैं, यदि उसे जड़ से सींचा जाए और केवल मात्र अध्यात्म ही ऐसा जल है जिसके द्वारा मानव के जीवन रूपी वृक्ष को सींच करके, उसके जीवन को भारतीय संस्कृति के सुंदर संस्कारों से पोषित किया जा सकता है। आज आवश्यकता है अपनी संतानों को सुंदर संस्कारों से सुसज्जित करने के लिए अपने समाज को सुंदर बनाने के लिए हम उस ब्रह्म ज्ञान की ओर अग्रसर हो। अपनी संतानों को भी उस अध्यात्म की ओर ले करके चले जो हमारे जीवन को सुंदर बनाता है । इस समाज को सुव्यवस्थित व सुंदर बनाने के लिए हम सभी अपना सहयोग प्रदान कर मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम से प्रेरणा लेकर अपने जीवन को जीएं!
कथा के दौरान श्री सेठ प्यारे लाल जी (अध्यक्ष, व्यापार मंडल पंजाब), श्री सुमीर जैन जी (महासचिव व्यापार मंडल पंजाब), श्री सुरिंदर दुग्गल जी(अध्यक्ष, व्यापार मंडल अमृतसर), श्री सुदर्शन वाधवा जी (अध्यक्ष, वेद कथा भवन), श्री अमृतपाल महाजन जी,श्री विजय रावली जी, श्री शिव महाजन जी, श्री रसिक चौहान जी, श्री विराट देवगन जी, स.सुरजीत सिंह जी, स.मंजीत सिंह जी, नारायण श्रीवास्तव जी,श्रीमती आशा देवी जी, श्रीमती किरण देवी जी, स्वामी रंजीतानंद जी, साधवी नीरजा भारती जी, साधवी कृष्णप्रीता भारती जी उपस्थित रहे
